لو كان بإمكاني: بقلم حسام خالد السعيد
..................................................
لو كان بإمكاني..
لو كان بإمكاني..
وضعتُ..
قُربَ يميني..
بالضَّبطِ..
على..
طاولةِ الحلمِ..
كلَّ..
أسرارِ الطبِ..
رهاناتُ..
يوكا اليابانِ..
ثقةُ..
الصينِ بالإبرِ..
وعلى يُسرايا..
قُربَ..
جهازَ الضغطِ..
وأكياسِ الدَّمِ..
رتبتُ عُلبي..
حسبَ..
قوانينِ القدرِ..
تستوطنها..
براري الهند..
من..
بومبايَ لكشميرِ
.....................
لو كان بإمكاني..
لأستحضرتُ..
تنينَ..
تقنياتِ العصر ِ..
حتى خبراءَ..
عرب الصحراءِ..
خيميائيو..
فراعنةِ النيلِ..
صيادلةَ الخزرِ ِ..
حكماءَ أزتكَ أنكا..
معلماتِ..
المايا الحُمرِ..
وفور إستعدادي..
لأرغمتُ الظلمَ..
على..
نومِ التخديرِ..
ثمَّ..
بدأتُ تحريري..
.....................
لو كان بإمكاني ..
لأطلقتُ..
سراحَ الطفلِ..
بعد..
كلِّ علاجات ِ ..
الجسدِ..
النفسِ..
النظرِ..
إذ..
جاءت البُشرى..
زفتها..
تقاريري..
ـ صالحٌ للفراشاتِ ـ
لأحلامِ الأزهارِ..
صار..
كتيريزا ..
كغاندي..
كفكرِ..
رجال الشعرِ..
كقلبِ..
نساءِ المطرِ
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لو كان بإمكاني..
لو كان بإمكاني..
وضعتُ..
قُربَ يميني..
بالضَّبطِ..
على..
طاولةِ الحلمِ..
كلَّ..
أسرارِ الطبِ..
رهاناتُ..
يوكا اليابانِ..
ثقةُ..
الصينِ بالإبرِ..
وعلى يُسرايا..
قُربَ..
جهازَ الضغطِ..
وأكياسِ الدَّمِ..
رتبتُ عُلبي..
حسبَ..
قوانينِ القدرِ..
تستوطنها..
براري الهند..
من..
بومبايَ لكشميرِ
.....................
لو كان بإمكاني..
لأستحضرتُ..
تنينَ..
تقنياتِ العصر ِ..
حتى خبراءَ..
عرب الصحراءِ..
خيميائيو..
فراعنةِ النيلِ..
صيادلةَ الخزرِ ِ..
حكماءَ أزتكَ أنكا..
معلماتِ..
المايا الحُمرِ..
وفور إستعدادي..
لأرغمتُ الظلمَ..
على..
نومِ التخديرِ..
ثمَّ..
بدأتُ تحريري..
.....................
لو كان بإمكاني ..
لأطلقتُ..
سراحَ الطفلِ..
بعد..
كلِّ علاجات ِ ..
الجسدِ..
النفسِ..
النظرِ..
إذ..
جاءت البُشرى..
زفتها..
تقاريري..
ـ صالحٌ للفراشاتِ ـ
لأحلامِ الأزهارِ..
صار..
كتيريزا ..
كغاندي..
كفكرِ..
رجال الشعرِ..
كقلبِ..
نساءِ المطرِ
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